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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 15

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 15
निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.15

Mantra: 3.15 [Kathopanishad_3.15]

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 15 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, तथा रसहीन, नित्य और गन्धरहित है; जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे भी पर और ध्रुव (निश्चल) है उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है ॥ १५ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यद् 【भाष्यार्थ】 जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा अरस, नित्य और अगन्धयुक्त 【शाङ्करभाष्यम्】 एतद्व्याख्यातं ब्रह्माव्ययम् — यद्धि शब्दादिमत्तद्व्येतीदं तु अशब्दादिमत्त्वादव्ययं न व्येति न क्षीयते, अत एव च नित्यं यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु न व्येत्यतो नित्यम्। इतश्च नित्यं अनाद्यविद्यमान आदिः कारणम् अस्य तदिदमनादि। यद्ध्यादि-मत्त्कार्यत्वादनित्यं कारणे प्रलीयते यथा पृथिव्यादि। इदं तु सर्वकारणत्वादकार्यमकार्यत्वान्नित्यं न तस्य कारणमस्ति यस्मिन्प्रलीयेत। तथानन्तम् अविद्यमानोऽन्तः-कार्यमस्य तदनन्तम्। यथा कदल्यादेः फलादिकार्योत्पादेन अपि अनित्यत्वं दृष्टं न च तथाप्यन्तवत्त्वं ब्रह्मणः; अतोऽपि नित्यम्। 【भाष्यार्थ】 है — ऐसी जिसकी व्याख्या की जाती है वह ब्रह्म अविनाशी है, क्योंकि जो पदार्थ शब्दादियुक्त होता है उसीका व्यय होता है; किन्तु यह ब्रह्म तो अशब्दादियुक्त होनेके कारण अव्यय है; इसका व्यय — क्षय नहीं होता, इसीलिए यह नित्य भी है; क्योंकि जिसका व्यय होता है वह अनित्य है। इसका व्यय नहीं होता इसलिये यह नित्य है। यह अनादि अर्थात् जिसका आदि — कारण विद्यमान नहीं है ऐसा होनेसे भी नित्य है, क्योंकि जो पदार्थ आदिमान् होता है वह कार्यरूप होनेसे अनित्य होता है और अपने कारणमें लीन हो जाता है; जैसे कि पृथिवी आदि। किन्तु यह आत्मा तो सबका कारण होनेसे अकार्य है और अकार्य होनेके कारण नित्य है। इसका कोई कारण नहीं है, जिसमें कि यह लीन हो। इसी प्रकार यह आत्मा अनन्त भी है। जिसका अन्त अर्थात् कार्य अविद्यमान हो उसे अनन्त कहते हैं। जिस प्रकार फलादि कार्य उत्पन्न करनेसे भी कदली आदि पौधोंकी अनित्यता देखी गयी है उस प्रकार ब्रह्मका अन्तवत्त्व नहीं देखा गया। इसलिए भी वह नित्य है। 【शाङ्करभाष्यम्】 महतो महत्तत्त्वाद्- बुद्ध्याख्यात्परं विलक्षणं नित्यविज्ञप्ति- स्वरूपत्वात्सर्वसाक्षी हि सर्व- भूतात्मत्वाद् ब्रह्म। उक्तं हि "एष सर्वेषु भूतेषु" (क० उ० १। ३। १२) इत्यादि। ध्रुवं च कूटस्थं नित्यं न पृथिव्यादिवदापेक्षिकं नित्य- त्वम्। तदेवम्भूतं ब्रह्मात्मानं निचाय्यावगम्य तमात्मानं मृत्युमुखान्मृत्युगोचरादविद्याकाम- कर्मलक्षणात्प्रमुच्यते विमुच्यते। 【भाष्यार्थ】 नित्यविज्ञप्तिस्वरूप होनेके कारण बुद्धिसंज्ञक महत्तत्त्वसे भी पर अर्थात् विलक्षण है, क्योंकि ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा होनेके कारण सबका साक्षी है। यह बात उपर्युक्त "एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते" इत्यादि मन्त्रमें कही ही गयी है। इसी प्रकार वह ध्रुव—कूटस्थ नित्य है। उसकी नित्यता पृथिवी आदिके समान आपेक्षिक नहीं है। उस इस प्रकारके ब्रह्म—आत्माको जानकर पुरुष मृत्युमुखसे—अविद्या, काम और कर्मरूप मृत्युके पंजेसे मुक्त—वियुक्त हो जाता है॥ १५॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 प्रस्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुतिः— 【भाष्यार्थ】 अब प्रस्तुत विज्ञानकी स्तुतिके लिये श्रुति कहती है—
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