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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 4

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 4

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.4

Mantra: 3.4 [Kathopanishad_3.4]

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 4 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको घोड़े बतलाते हैं तथा उनके घोड़ेरूपसे कल्पना किये जानेपर विषयोंको उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ॥ ४ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान् आहुः रथकल्पनाकुशलाः शरीररथाकर्षणसामान्यात् । तेष्वेव इन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु गोचरान् मागान्रूपादीन्विषयान् विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तः शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं संयुक्तमात्मानं भोक्तेति संसारीत्याहुर्मनीषिणो विवेकिनः । न हि केवलस्यात्मनो भोक्तृत्वमस्ति बुद्ध्याद्युपाधिकृतमेव तस्य भोक्तृत्वम् । तथा च श्रुत्यन्तरं केवलस्याभोक्तृत्वमेव दर्शयति—"ध्यायतीव लेलायतीव" ( बृ० उ० ४ । ३ । ७ ) इत्यादि । एवं च सति वक्ष्यमाणा रथकल्पनया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यते नान्यथा स्वभावानतिक्रमात् ॥ ४ ॥ 【भाष्यार्थ】 रथकी कल्पना करनेमें कुशल पुरुषोंने चक्षु आदि इन्द्रियोंको घोड़े बतलाया है, क्योंकि [इन्द्रिय और घोड़ोंकी क्रमशः] शरीर और रथको खींचनेमें समानता है। इस प्रकार उन इन्द्रियोंको घोड़ेरूपसे परिकल्पित किये जानेपर रूपादि विषयोंको उनके मार्ग जानो तथा शरीर इन्द्रिय और मनके सहित अर्थात् उनसे युक्त आत्माको मनीषि—विवेकी पुरुष 'यह भोक्ता—संसारी है' ऐसा बतलाते हैं। केवल (शुद्ध) आत्मा तो भोक्ता है नहीं; उसका भोक्तृत्व तो बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही है। इसी प्रकार "ध्यान करता हुआ—सा, चेष्टा करता हुआ—सा" इत्यादि एक दूसरी श्रुति भी केवल आत्माका अभोक्तृत्व ही दिखलाती है। ऐसा होनेपर ही रथकल्पनासे उस वैष्णवपदकी आगे कही जानेवाली आत्मभावसे प्रतिपत्ति (प्राप्ति) बन सकती है—और किसी प्रकार नहीं, क्योंकि स्वभाव कभी नहीं बदल सकता ॥ ४ ॥
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