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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 8
विवेकीकी परमपदप्राप्ति

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.8

Mantra: 3.8 [Kathopanishad_3.8]

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 8 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

किन्तु जो विज्ञानवान्, संयतचित्त और सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उस पदको प्राप्त कर लेता है जहाँसे वह फिर उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान् विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वान् इत्येतत्; युक्तमनाः समनस्कः स तत एव सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति, यस्मादासाद्यत्पदाद् अप्रच्युतः सम्भूयः पुनर्न जायते संसारे ॥ ८ ॥ 【भाष्यार्थ】 किन्तु जो दूसरा रथी अर्थात् विद्वान् विज्ञानवान्—कुशल सारथीसे युक्त, समनस्क—युक्तचित्त और इसीलिए सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उसी पदको प्राप्त कर लेता है, जिस प्राप्त हुए पदसे च्युत न होकर वह फिर संसारमें उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 . किं तत्पदमित्याह— 【भाष्यार्थ】 वह पद क्या है? इसपर कहते हैं—
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