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कठोपनिषद् • वल्ली 4, मन्त्र 10

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 4 • मन्त्र 10
भेददृष्टिकी निन्दा

Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.10

Mantra: 4.10 [Kathopanishad_4.10]

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥ १०॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो तत्त्व इस (देहेन्द्रियसङ्घात)-में भासता है वही अन्यत्र (देहादिसे परे) भी है और जो अन्यत्र है वही इसमें है। जो मनुष्य इस तत्त्वमें नानात्व देखता है वह मृत्युसे मृत्युको [अर्थात् जन्म-मरणको] प्रास होता है ॥ १०॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यदेवेह कार्यकरणोपाधि- समन्वितं संसारधर्मवदवभासमान- मविवेकिनां तदेव स्वात्मस्थ- ममुत्र नित्यविज्ञानघनस्वभावं सर्वसंसारधर्मवर्जितं ब्रह्म। यच्चामुत्रामुष्मिन्नात्मनि स्थितं तदेवेह नामरूपकार्यकरणोपाधिम् अनुविभाव्यमानं नान्यत्। तत्रैवं सत्युपाधिस्वभावभेद- दृष्टिलक्षणयाविद्यया मोहितः सन् य इह ब्रह्मण्यनानाभूते परस्मादन्योऽहं मत्तोऽन्यत्परं ब्रह्मेति नानेव भिन्नमिव पश्यत्युपलभते स मृत्योर्मरणान्मरणं मृत्युं पुनः पुनर्जन्ममरणभाव- माप्नोति प्रतिपद्यते। तस्मात्तथा न 【भाष्यार्थ】 जो इस लोकमें कार्य-करण (देहेन्द्रिय) रूप उपाधिसे युक्त होकर अविवेकियोंको संसारधर्मयुक्त भास रहा है स्वस्वरूपमें स्थित वही ब्रह्म अन्यत्र (इन देहादिसे परे) नित्य विज्ञानघनस्वरूप और सम्पूर्ण संसार-धर्मोंसे रहित है। तथा जो अमुत्र—उस आत्मामें अर्थात् परमात्मभावमें स्थित है वही इस लोकमें नाम-रूप एवं कार्य-करणरूप उपाधिके अनुरूप भासनेवाला आत्मतत्त्व है; और कोई नहीं। ऐसा होनेपर भी जो पुरुष उपाधिके स्वभाव और भेददृष्टिरूप अविद्यासे मोहित होकर इस अभिन्नभूत—एकरूप ब्रह्ममें 'मैं परमात्मासे भिन्न हूँ और परमात्मा मुझसे भिन्न है'—इस प्रकार भिन्नवत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको अर्थात् बारम्बार जन्म-मरण-भावको प्राप्त होता है। अतः ऐसी दृष्टि नहीं करनी चाहीये। बल्कि 'मैं 【शाङ्करभाष्यम्】 पश्येत्। विज्ञानैकरसं नैरन्तर्येणाकाशवत् परिपूर्णं ब्रह्मैवाहमस्मीति पश्येद् इति वाक्यार्थः॥ १०॥ 【भाष्यार्थ】 निर्बाधरूपसे आकाशके समान परिपूर्ण और विज्ञानैकरसस्वरूप ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार देखे। यही इस वाक्यका अर्थ है ॥ १०॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 प्रागेकत्वविज्ञानादाचार्यागम-संस्कृतेन— 【भाष्यार्थ】 एकत्व-ज्ञान होनेसे पहले आचार्य और शास्त्रसे संस्कारयुक्त हुए—