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कठोपनिषद् • वल्ली 4 • मन्त्र 11
Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.11
Mantra: 4.11
[Kathopanishad_4.11]
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन। मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है। इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नहीं है। जो पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको जाता है ॥ ११॥
भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)
【शाङ्करभाष्यम्】
मनसेदं ब्रह्मैकरसमाप्तव्यम् आत्मैव नान्यदस्तीति। आत्मे च नानात्वप्रत्युपस्थापिकाया अविद्याया निवृत्तत्वादिह ब्रह्मणि नाना नास्ति किञ्चनाणुमात्रम् अपि। यस्तु पुनरविद्यातिमिरदृष्टिं न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योर्मृत्युं गच्छत्येव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन् इत्यर्थः॥ ११॥
【भाष्यार्थ】
मनके द्वारा ही यह एकरस ब्रह्म 'सब कुछ आत्मा ही है, और कुछ नहीं है' इस प्रकार प्राप्त करने योग्य है। इस प्रकार उसकी प्राप्ति हो जानेपर नानात्वको स्थापित करनेवाली अविद्याके निवृत्त हो जानेसे इस ब्रह्मतत्त्वमें किञ्चित्—अणुमात्र भी नानात्व नहीं रहता। किन्तु जो पुरुष अविद्यारूप तिमिररोगग्रस्त दृष्टिको नहीं त्यागता बल्कि नानात्व ही देखता है वह इस प्रकार थोड़ा-सा भी भेद आरोपित करनेसे मृत्युसे मृत्युको [अर्थात् जन्म-मरणको] प्राप्त होता ही है॥ ११॥
【शाङ्करभाष्यम्】
पुनरपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह—
【भाष्यार्थ】
फिर भी उस प्रकृत ब्रह्मका ही वर्णन करते हैं—
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