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कठोपनिषद् • वल्ली 4, मन्त्र 13

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 4 • मन्त्र 13

Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.13

Mantra: 4.13 [Kathopanishad_4.13]

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥ एतद्वै तत् ॥ १३ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। यह भूत-भविष्यत्का शासक है। यही आज (वर्तमान कालमें) है और यही कल (भविष्यमें) भी रहेगा। और निश्चय यही वह (ब्रह्मतत्त्व) है ॥ १३ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकोऽधूमकमिति युक्तं ज्योतिष्मत्त्वात्। यस्त्वेवं लक्षितो योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य स नित्यः कूटस्थोऽद्येदानीं प्राणिषु वर्तमानः स उ श्वोऽपि वर्तिष्यते नान्यस्तत्समोऽन्यश्च जनिष्यत इत्यर्थः। अनेन नायमस्तीति चैक इत्ययं पक्षो न्यायतोऽप्राप्तोऽपि स्ववचनेन श्रुत्या प्रत्युक्तस्तथा क्षणभङ्गवादश्च॥ १३॥ 【भाष्यार्थ】 वह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। मूल मन्त्रमें जो 'अधूमकः' पद है वह [नपुंसकलिङ्ग] 'ज्योतिः' शब्दका विशेषण होनेके कारण 'अधूमकम्' ऐसा होना चाहिये। जो योगियोंको इस प्रकार हृदयमें लक्षित होता है वह भूत और भविष्यत्का शास्ता नित्य कूटस्थ आज—इस समय प्राणियोंमें वर्तमान है और वही कल भी रहेगा, अर्थात् उसके समान कोई और पुरुष उत्पन्न नहीं होगा। इससे 'कोई कहते हैं कि यह नहीं है' ऐसा [१।१।२० मन्त्रमें कहा हुआ] जो पक्ष है वह यद्यपि न्यायतः प्राप्त नहीं होता तथापि उसका और बौद्धोंके क्षणभङ्गवादका खण्डन भी श्रुतिने स्ववचनसे कर दिया है ॥ १३॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 पुनरपि भेददर्शनापवादं ब्रह्मण आह— 【भाष्यार्थ】 ब्रह्ममें जो भेददृष्टि की जाती है उसका अपवाद श्रुति फिर भी कहती है—