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कठोपनिषद् • वल्ली 4, मन्त्र 3

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 4 • मन्त्र 3
आत्मज्ञकी सर्वज्ञता

Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.3

Mantra: 4.3 [Kathopanishad_4.3]

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांश्च मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 3 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस इस आत्माके द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखोंको निश्चयपूर्वक जानता है [ उस आत्मासे अविज्ञेय ] इस लोकमें और क्या रह जाता है ? [ तुझ नचिकेताका पूछा हुआ ] वह तत्त्व निश्चय यही है ॥ ३ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 येन विज्ञानस्वभावेनात्मना रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांश्च मैथुनान्—मैथुननिमित्तान्सुखप्रत्ययान्विजानाति विस्पष्टं जानाति सर्वो लोकः । ननु नैवं प्रसिद्धिर्लोकस्य आत्मना देहादिविलक्षणोऽहं विजानामीति । देहादिसंघातोऽहं विजानामीति तु सर्वो लोकोऽवगच्छति । न त्वेवम् । देहादिसंघातस्यापि शब्दादिस्वरूपत्वाविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्तं विज्ञातृत्वम् । यदि हि देहादिसंघातो रूपाद्यात्मकः सन्रूपादीन्विजानीयाद्बाह्या अपि रूपादयोऽन्योन्यं स्वं स्वं रूपं च विजानीयुः । न चैतदस्ति । तस्माद्देहादिलक्षणांश्च रूपादीनेतेनैव देहादिव्यतिरिक्तैनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना 【भाष्यार्थ】 सम्पूर्ण लोक जिस विज्ञानस्वरूप आत्माके द्वारा रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन—मैथुनजनित सुखोंको स्पष्टतया जानता है [ वही ब्रह्म है ] । शङ्का—परन्तु लोकमें ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं किसी देहादिसे विलक्षण आत्माद्वारा जानता हूँ । सब लोग यही समझते हैं कि मैं देहादि संघातरूप ही सब कुछ जानता हूँ । समाधान—ऐसी बात तो नहीं है, क्योंकि देहादि संघात भी समानरूपसे शब्दादिरूप तथा विज्ञेयस्वरूप है; अतः उसे ज्ञाता मानना उचित नहीं है । यदि देहादि संघात रूप-रसादिस्वरूप होकर भी रूपादिको जान ले तो बाह्य रूपादि भी परस्पर एक-दूसरेको तथा अपने-अपने रूपको जान लेंगे; किन्तु यह बात है नहीं । अतः लोक देहादिस्वरूप रूपादिको इस देहादिव्यतिरिक्त विज्ञान-स्वभाव आत्माके द्वारा ही जानता है । 【शाङ्करभाष्यम्】 विजानाति लोकः । यथा येन लोहो दहति सोऽग्निरिति तद्वत् । आत्मनोऽविज्ञेयं किमत्रास्मिँल्लोके परिशिष्यते न किञ्चित्परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञेयं न किञ्चित्परिशिष्यते स आत्मा सर्वज्ञः । एतद्वै तत् । किं तद्यद् नचिकेतसा पृष्टं देवादिभिरपि विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद् विष्णोः परमं पदं यस्मात्परं नास्ति तद्वा एतदधिगतमित्यर्थः ॥ ३॥ 【भाष्यार्थ】 जिस प्रकार लोहा जिसके द्वारा जलता है उसे अग्नि कहते हैं उसी प्रकार [जिसके द्वारा लोक देहादि विषयोंको जानता है उसे आत्मा कहते हैं] । उस आत्मासे जिसका ज्ञान न हो सके ऐसा क्या पदार्थ इस लोकमें रह जाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं रहता—सभी कुछ आत्मासे ही जाना जा सकता है। [इस प्रकार] जिस आत्मासे अविज्ञेय कोई भी वस्तु नहीं रहती वह आत्मा सर्वज्ञ है और यही वह है। वह कौन है? जिसके विषयमें तुझ नचिकेताने प्रश्न किया है, जो देवादिका भी सन्देहास्पद है तथा जो धर्माधर्मादिसे अन्य विष्णुका परम पद है और जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है वही यह [ब्रह्मपद] अब ज्ञात हुआ है—ऐसा इसका भावार्थ है ॥ ३॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 अतिसूक्ष्मत्वादुर्विज्ञेयमिति मत्वैतमेवार्थं पुनः पुनराह— 【भाष्यार्थ】 वह ब्रह्म अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्विज्ञेय है—ऐसा मानकर उसी बातको बारम्बार कहते हैं—
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