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कठोपनिषद् • वल्ली 6, मन्त्र 14

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 6 • मन्त्र 14
अमर कब होता है ?

Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.14

Mantra: 6.14 [Kathopanishad_6.14]

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो कि इसके हृदयमें आश्रय करके रहती हैं, छूट जाती हैं उस समय वह मर्त्य (मरणधर्मा) अमर हो जाता है और इस शरीरसे ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यदा यस्मिन्काले सर्वे कामाः | कामत्यागेन कामयितव्यान्य- अमृतत्वम् स्याभावात्प्रमुच्यन्ते वि- शीर्यन्ते येऽस्य प्राक्प्रति- बोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिताः । बुद्धिर्हि कामानामाश्रयो नात्मा । ''कामः संकल्पः '' ( बृ० उ० १ । ५ । ३ ) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च । 【भाष्यार्थ】 जब—जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ कामनायोग्य अन्य पदार्थका अभाव होनेके कारण छूट जाती हैं—छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जो कि बोध होनेसे पूर्व इस विद्वान्के हृदय—बुद्धिमें आश्रित रहती हैं—क्योंकि बुद्धि ही कामनाओंका आश्रय है, आत्मा नहीं; जैसा कि ''कामना, संकल्प [और संशय—ये सब मन ही हैं]'' इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे भी सिद्ध होता है। 【शाङ्करभाष्यम्】 अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधाद् आसीत्स प्रबोधोत्तरकालमविद्या- कामकर्मलक्षणस्य मृत्यो- र्विनाशादमृतो भवति । गमन- प्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गमना- नुपपत्तेरिहैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्व- 【भाष्यार्थ】 तब फिर जो आत्मसाक्षात्कारसे पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्मज्ञान होनेके अनन्तर अविद्या, कामना और कर्मरूप मृत्युका नाश हो जानेसे अमर हो जाता है। परलोकमें गमन करानेवाले मृत्युका विनाश हो जानेसे वहाँ जाना सम्भव न होनेके कारण वह इस लोकमें ही दीपनिर्वाणके समान सम्पूर्ण बन्धनोंके नष्ट हो 【शाङ्करभाष्यम्】 बन्धनोपशमाद्ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥ 【भाष्यार्थ】 जानेसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १४ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 कदा पुनः कामानां मूलतो विनाश इत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 परन्तु कामनाओंका समूल नाश कब होता है ? इसपर कहते हैं—