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Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.14
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 14 का आध्यात्मिक रहस्य