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कठोपनिषद् • वल्ली 6, मन्त्र 16

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 6 • मन्त्र 16

Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.16

Mantra: 6.16 [Kathopanishad_6.16]

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य- स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इस हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाका भेदन करके बाहरको निकली हुई है। उसके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त होता है। शेष विभिन्न गतियुक्त नाड़ियाँ उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग)-की हेतु होती हैं॥ १६ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 शतं च शतसंख्याका एका च सुषुम्नाभेदेन सुषुम्ना नाम पुरुषस्य- अमृतत्वम् हृदयाद्विनिःसृता नाड्यः शिरा- स्तासां मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता निर्गता सुषुम्ना नाम। तयान्तकाले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत्। 【भाष्यार्थ】 पुरुषके हृदयसे सौ अन्य और सुषुम्ना नामकी एक—इस प्रकार [एक सौ एक] नाड़ियाँ—शिराएँ निकली हैं। उनमें सुषुम्ना-नाम्नी नाडी मस्तकका भेदन करके बाहर निकल गयी है। अन्तकालमें उसके द्वारा आत्माको अपने हृदयदेशमें वशीभूत करके समाहित करे। 【शाङ्करभाष्यम्】 तया नाड्योर्ध्वमुपर्यायन् गच्छन्नादित्याद्वारेणामृतत्वममरण- धर्मत्वमापेक्षिकम्। “आभूत- संप्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते” 【भाष्यार्थ】 उस नाडीके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर जानेवाला जीव सूर्यमार्गसे अमृतत्व—आपेक्षिक अमरणधर्मत्वको प्राप्त हो जाता है, जैसा कि “सम्पूर्ण भूतोंके क्षयपर्यन्त रहनेवाला स्थान अमृतत्व कहलाता है” 【शाङ्करभाष्यम्】 ( वि० पु० २ । ८ । ९७) इति स्मृतेः। ब्रह्मणा वा सह कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोकगतान् । विष्वङ्नानाविधगतयः अन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्तं भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ १६ ॥ 【भाष्यार्थ】 इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है। अथवा [यह भी तात्पर्य हो सकता है कि] कालान्तरमें ब्रह्माके साथ ब्रह्मलोकके अनुपम भोगोंको भोगकर मुख्य अमृतत्वको प्राप्त करता है। इसके सिवा जिनकी गति विविध भाँतिकी हैं ऐसी अन्य सब नाड़ियाँ प्राणप्रयाणकी हेतु होती हैं, अर्थात् वे संसारप्राप्तिके लिये ही होती हैं॥ १६॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 इदानीं सर्ववल्ल्यर्थोपसंहारार्थमाह— 【भाष्यार्थ】 अब सम्पूर्ण वल्लियोंके अर्थका उपसंहार करनेके लिये कहते हैं—