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कठोपनिषद् • वल्ली 6, मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 6 • मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.8

Mantra: 6.8 [Kathopanishad_6.8]

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 8 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है और वह व्यापक तथा अलिङ्ग है; जिसे जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापको व्यापकस्याप्याकाशादेः सर्वस्य 【भाष्यार्थ】 अव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है । वह आकाशादि सम्पूर्ण व्यापक पदार्थोंका 【शाङ्करभाष्यम्】 कारणत्वात्। अलिङ्गो लिङ्ग्यते गम्यते येन तल्लिङ्गं बुद्ध्यादि तदविद्यमानमस्येति सोऽयमलिङ्ग एव। सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत्। यं ज्ञात्वा आचार्यतः शास्त्रतश्च मुच्यते जन्तुः, अविद्यादिहृदय-ग्रन्थिभिर्जीवन्नेव पतितेऽपि शरीरेऽमृतत्वं च गच्छति सोऽलिङ्गः परोऽव्यक्तात् पुरुष इति पूर्वेणैव सम्बन्धः ॥ ८ ॥ 【भाष्यार्थ】 भी कारण होनेसे व्यापक है। और अलिङ्ग है—जिसके द्वारा कोई वस्तु जानी जाती है वह बुद्धि आदि लिङ्ग कहलाते हैं, परन्तु पुरुषमें इनका अभाव है इसलिये यह अलिङ्ग अर्थात् सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित ही है। जिसे आचार्य और शास्त्रद्वारा जानकर पुरुष जीवित रहते हुए ही अविद्या आदि हृदयकी ग्रन्थियोंसे मुक्त हो जाता है तथा शरीरका पतन होनेपर भी अमरत्वको प्राप्त होता है वह पुरुष अलिङ्ग है और अव्यक्तसे भी पर है—इस प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे सम्बन्ध है ॥ ८ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 कथं तर्ह्यलिङ्गस्य दर्शनम् उपपद्यत इत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 तो फिर जिसका कोई लिङ्ग (ज्ञापक चिह्न) नहीं है उस [आत्मा]-का दर्शन होना किस प्रकार सम्भव है? इसपर कहा जाता है—
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