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केनोपनिषद् • खण्ड 3, मन्त्र 12

Kena Upanishad • सामवेद (Samaveda - Talavakara Brahmana)

केनोपनिषद् • खण्ड 3 • मन्त्र 12

Kena Upanishad 3.12

Mantra: 3.12 [Kenopanishad_3.12]

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाँ हैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥ १२॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 12 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

वह इन्द्र उसी आकाश में अति शोभावाली सुवर्ण से भूषिता उमा नामक (पार्वती रूपिणी ब्रह्मविद्या) स्त्री से मिले और उससे पूछा कि यह यक्ष कौन है ? ॥१२॥

आशय यह है कि स्थूल इन्द्रियां कभी ब्रह्म को प्राप्त कर ही नहीं सकतीं, किन्तु आत्मा भी बिना सूक्ष्म बुद्धि की सहायता के उस अविनाशी प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकती। इससे से यह भी विदित होता है कि तत्वों में प्रधान अग्नि और वायु तत्व भी उसी परमपिता ब्रह्मारूप परमात्मा के सामर्थ्य से शक्ति प्राप्त करते हैं अन्यथा स्वयं इनमें एक तिनके को जलाने और उड़ाने तक का सामर्थ्य नहीं है।
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