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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 2 • Mantra 32

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 2 • मन्त्र 32

10.2.32

Mantra ID: 10.2.32

तस्मि॑न्हिर॒ण्यये॒ कोशे॒ त्र्य॑रे॒ त्रिप्र॑तिष्ठिते । तस्मि॒न्यद्य॒क्षमा॑त्म॒न्वत्तद्वै ब्र॑ह्म॒विदो॑ विदुः ॥ (३२)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.2.32 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

उस नौ द्वारों वाले हिरण्यमय कोष में जो आत्मा स्थित है, वहां जो यज्ञ का विस्तार करते हैं, वे ही ब्रह्मज्ञानी माने जाते हैं. (३२)

EN English Translation

The soul that is located in that nine-door Hiranyamaya kosh, those who expand the yajna there are considered to be brahmagyanis. (32)

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