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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 4 • Mantra 25

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 4 • मन्त्र 25

10.4.25

Mantra ID: 10.4.25

अङ्गा॑दङ्गा॒त्प्र च्या॑वय॒ हृद॑यं॒ परि॑ वर्जय । अधा॑ वि॒षस्य॒ यत्तेजो॑ऽवा॒चीनं॒ तदे॑तु ते ॥ (२५)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.4.25 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे रोगी! तू अपने प्रत्येक अंग से विष को टपकाता हुआ अपने हृदय की रक्षा कर. विष का जो तेज है, वह अधोगति को प्राप्त हो कर नष्ट हो जाए. (२५)

EN English Translation

O patient! Protect your heart by dripping poison from each part of you. The intensity of the poison should be destroyed by attaining degradation. (25)

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