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अथर्ववेद

Kanda 11 • Sukta 4 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 11 • सूक्त 4 • मन्त्र 4

11.4.4

Mantra ID: 11.4.4

तत॑श्चैनम॒न्येन॒ मुखे॑न॒ प्राशी॒र्येन॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । मु॑ख॒तस्ते॑ प्र॒जा म॑रिष्य॒तीत्ये॑नमाह । तं वा अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । ब्रह्म॑णा॒ मुखे॑न । तेनै॑नं॒ प्राशि॑षं॒ तेनै॑नमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 11.4.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

"हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान कर्ता ऋषियों ने जिस मुख से इस ओदन को खाया था, यदि तुम ने उस से भिन्न उस के मुख की ओर से खाया तो तुम्हारी संतान मर जाएगी'-गुरु इस प्रकार अपने शिष्य से कहे. शिष्य कहे कि मैं ने इस ओदन को न पराङ्मुख हो कर खाया और न सामने हो कर खाया और न आत्माभिमुख हो कर खाया. मैं ने इसे ब्रह्मरूपी मुख की ओर से खाया. मैं ने इस ओदन को इसी मुख से खाया और वहीं पहुंचाया है, जहां इसे पहुंचना चाहिए था. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला एवं संपूर्ण शरीर से युक्त है. जो पुरुष ऊपर बताई हुई विधि से इस ओदन को खाना जानता है, वही संपूर्ण अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला होता है. (४)

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