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अथर्ववेद

Kanda 14 • Sukta 2 • Mantra 47

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 14 • सूक्त 2 • मन्त्र 47

14.2.47

Mantra ID: 14.2.47

य ऋ॒तेचि॑दभि॒श्रिषः॑ पु॒रा ज॒त्रुभ्य॑ आ॒तृदः॑ । सन्धा॑ता स॒न्धिं म॒घवा॑पुरू॒वसु॒र्निष्क॑र्ता॒ विह्रु॑तं॒ पुनः॑ ॥ (४७)

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अथर्ववेद मन्त्र 14.2.47 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो चिपके बिना तथा छेद किए बिना इन हड्डियों को जोड़ देता है, जो फटे हुए को पुनः जोड़ता है तथा उत्तम और पर्याप्त धन प्रदान करता है, वही ईश्वर है. (४७)

EN English Translation

He who attaches these bones without sticking and piercing, who reconnects the torn and provides good and sufficient wealth, is God. (47)

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