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अथर्ववेद

Kanda 15 • Sukta 13 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 15 • सूक्त 13 • मन्त्र 5

15.13.5

Mantra ID: 15.13.5

तद्‌ यस्यैवं विद्वान्‌ व्रात्यस्तृतीयां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 15.13.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यदि ऐसा विद्वान्‌ व्रात्य अतिथि के रूप में गृहस्थ के घर में तीसरी रात्रि में भी निवास करता है तो उस के फल से वह गृहस्थ आकाश में स्थित समस्त पुण्य लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (५)

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