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अथर्ववेद

Kanda 15 • Sukta 4 • Mantra 9

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 15 • सूक्त 4 • मन्त्र 9

15.4.9

Mantra ID: 15.4.9

वार्षि॑कावेनं॒मासौ॑ प्र॒तीच्या॑ दि॒शो गो॑पायतो वैरू॒पं च॑ वैरा॒जं चानु॑ तिष्ठतो॒ य ए॒वंवेद॑ ॥ (९)

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अथर्ववेद मन्त्र 15.4.9 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो इस बात को जानता है, वह पश्चिम दिशा की ओर से वर्षा ऋतु के दो महीनों द्वारा रक्षित रहता है तथा वैरूप और वैराज उस के अनुकूल रहते हैं. (९)

EN English Translation

One who knows this is protected from the west side by two months of the rainy season and Vairoop and Vairaj are favorable to him. (9)

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