Popular:
अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 3 • Mantra 52

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 3 • मन्त्र 52

18.3.52

Mantra ID: 18.3.52

उत्ते॑ स्तभ्नामिपृथि॒वीं त्वत्परी॒मं लो॒गं नि॒दध॒न्मो अ॒हं रि॑षम् । ए॒तां स्थूणां॑ पि॒तरो॑धारयन्ति ते॒ तत्र॑ य॒मः साद॑ना ते कृणोतु ॥ (५२)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 18.3.52 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मृत पुरुष! तेरे लिए मैं इस पृथ्वी को ऊंची बनाता हूं. तेरे चारों ओर सभी प्राणियों से युक्त इस भूलोक को धारण करता हुआ मैं हिंसा का आधार न बनूं. पितृ देवता उस प्रसिद्ध यूनी को तुम्हारे घर का निर्णायक करने के लिए स्थापित करते हैं. (५२)

EN English Translation

O dead man! For you, I make this earth high. I should not become the basis of violence by holding this land of all beings around you. The father god installs that famous Uni to decide your house. (52)

शास्त्र जिज्ञासा
ध्यान मोड सक्रिय |
॥ पठन सेटिंग्स ॥

ध्यान मोड (Focus Mode)

नेविगेशन व शीर्षक छुपाएं

पृष्ठभूमि रंग (Theme)

अक्षर आकार (Font Size)

लिपि शैली (Typography)

प्रामाणिक वैदिक पाठन अनुभव • HinduText