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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 3 • Mantra 55

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 3 • मन्त्र 55

18.3.55

Mantra ID: 18.3.55

यत्ते॑ कृ॒ष्णःश॑कु॒न आ॑तु॒तोद॑ पिपी॒लः स॒र्प उ॒त वा॒ श्वाप॑दः । अ॒ग्निष्टद्वि॒श्वाद॑ग॒दंकृ॑णोतु॒ सोम॑श्च॒ यो ब्रा॑ह्म॒णाँ आ॑वि॒वेश॑ ॥ (५५)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 18.3.55 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे पुरुष! तेरे जिस अंग को काले रंग के पक्षी कोवे ने काट लिया है तथा विषैले दांतों वाली विशेष चींटियों ने, सांप ने अथवा बाघ ने काट लिया है, तेरे उस अंग को सर्वभक्षक अग्नि रोग रहित बनाएं. जिस सोम ने रस के रूप में ऋषियों में प्रवेश किया है, वह सोम तुझे रोग रहित बनाए. (५५)

EN English Translation

O man! Make your part, which has been bitten by the black bird Cove and has been bitten by special ants, snakes or tigers with venomous teeth, make that part of yours free from all-pervading agni diseases. The som, which has entered the sages in the form of rasa, may he make you disease-free. (55)

शास्त्र जिज्ञासा
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