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अथर्ववेद

Kanda 19 • Sukta 45 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 19 • सूक्त 45 • मन्त्र 5

19.45.5

Mantra ID: 19.45.5

आक्ष्वैकं॑ म॒णिमेकं॑ कृणुष्व स्ना॒ह्येके॒ना पि॒बैक॑मेषाम् । चतु॑र्वीरं नैरृ॒तेभ्य॑श्च॒तुर्भ्यो॒ ग्राह्या॑ ब॒न्धेभ्यः॒ परि॑ पात्व॒स्मान् ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 19.45.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इंद्र के कवच से सुरक्षित होने के कारण इस आस्तृत मणि के एक सौ एक सामर्थ्य हैं तथा हजारों प्राण अर्थात्‌ बल हैं. तुम बाघ के समान सभी शत्रुओं पर आक्रमण कर के उन्हें पराजित करने में समर्थ बनो. मेरा जो शत्रु तुझ मणि से युद्ध करने की इच्छा करे, वह पराजित हो. हे आस्तृत मणि! सब देव तुम्हारी रक्षा करें. (५)

EN English Translation

Being protected by Indra's armor, this attested gem has one hundred and one power and thousands of lives. Be able to attack all enemies like a tiger and defeat them. May my enemy who wishes to fight with your gem be defeated. O gem stone! May all gods protect you. (5)

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