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अथर्ववेद

Kanda 2 • Sukta 25 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 2 • सूक्त 25 • मन्त्र 5

2.25.5

Mantra ID: 2.25.5

परा॑च एना॒न्प्र णु॑द॒ कण्वा॑ञ्जीवित॒योप॑नान् । तमां॑सि॒ यत्र॒ गछ॑न्ति॒ तत्क्र॒व्यादो॑ अजीगमम् ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 2.25.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे पृश्निपर्णी! प्राणों का नाश करने वाले एवं कोढ़ आदि रोगों को उत्पन्न करने वाले कण्व नामक पापों को पीछे की ओर जाने को विवश कर. मैं भी कुष्ठ आदि रोगों को वहां भेजता हूं, जहां सूर्योदय के बाद अंधकार चला जाता है. (५)

EN English Translation

O ponyle! By forcing the sins called Kanva, which destroys life and causes diseases like leprosy, to go backwards. I also send diseases like leprosy to the place where darkness goes after sunrise. (5)

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