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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 133 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 133 • मन्त्र 1

20.133.1

Mantra ID: 20.133.1

वित॑तौ किरणौ॒ द्वौ तावा॑ पिनष्टि॒ पूरु॑षः । न वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.133.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे कुमारी! तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. दो किरणें फैली हुई हैं. पुरुष उन्हें पीसने वाला है. (१)

EN English Translation

O virgin! He is not what you think of him. Two rays are spread. The man is going to grind them. (1)

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