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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 53 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 53 • मन्त्र 1

20.53.1

Mantra ID: 20.53.1

क ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद्वयो॑ दधे । अ॒यं यः पुरो॑ विभि॒नत्त्योज॑सा मन्दा॒नः शि॒प्र्यन्ध॑सः ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.53.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

स्तोत्रों को सुन कर सुंदर ठोढी वाले इन्द्र प्रसन्न होते हैं और शत्रुओं के नगरों का विनाश कर देते हैं. इस बात को कौन नहीं जानता है कि सोम के तैयार होने पर इंद्र कौन सा वैभव धारण करते हैं. (१)

EN English Translation

Hearing the hymns, Indra, who has a beautiful chin, is pleased and destroys the cities of enemies. Who does not know what glory Indra holds when Som is ready? (1)

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