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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 75 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 75 • मन्त्र 3

20.75.3

Mantra ID: 20.75.3

आदित्ते॑ अ॒स्य वी॒र्यस्य चर्किर॒न्मदे॑षु वृषन्नु॒शिजो॒ यदावि॑थ सखिय॒तो यदावि॑थ । च॒कर्थ॑ का॒रमे॑भ्यः॒ पृत॑नासु॒ प्रव॑न्तवे । ते अ॒न्याम॑न्यां न॒द्यं सनिष्णत॒ श्रव॒स्यन्तः॑ सनिष्णत ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.75.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे धन समर्थ जलो! हम तुम्हारे वीर्य का वर्णन करते हैं. इंद्र के उन्मत्त होने पर तुम ही उन की रक्षा करते हो. तुम सेनाओं में सेवा योग्य कर्म के करने वाले हो. तुम नदियों के आश्रय में रहो तथा अन्न प्रदान करते हुए सब के स्नान के साधन बनो. (३)

EN English Translation

O wealth is strong! We describe your semen. When Indra is mad, you protect him. You are the doers of service in armies. Stay in the shelter of the rivers and become the means of bathing for all while providing food. (3)

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