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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 91 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 91 • मन्त्र 4

20.91.4

Mantra ID: 20.91.4

अ॒वो द्वाभ्यां॑ प॒र एक॑या॒ गा गुहा॒ तिष्ठ॑न्ती॒रनृ॑तस्य॒ सेतौ॑ । बृह॒स्पति॒स्तम॑सि॒ ज्योति॑रि॒च्छन्नुदु॒स्रा आक॒र्वि हि ति॒स्र आवः॑ ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.91.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पहले दो से, फिर एक से हृदय रूपी गुफा में स्थित वाणियों को बाहर निकालते हुए तथा अंधकार में प्रकाश की कामना करने वाले बृहस्पति प्रकाशों को प्रकट करते हैं. (४)

EN English Translation

From the first two, then from one heart, Jupiter, who seeks light in the darkness, reveals the light, taking out the arrows in the cave in the form of a heart. (4)

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