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अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 13 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 13 • मन्त्र 4

3.13.4

Mantra ID: 3.13.4

एको॑ वो दे॒वोऽप्य॑तिष्ठ॒त्स्यन्द॑माना यथाव॒शम् । उदा॑निषुर्म॒हीरिति॒ तस्मा॑दुद॒कमु॑च्यते ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 3.13.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अकेले इंद्र ने इच्छानुसार इधरउधर बहने वाले तुम्हें प्रतिष्ठित किया था. इंद्र से सम्मानित हो कर तुम ने अपने को महान समझ लिया. इस कारण तुम्हें उदक कहा जाता है. (४)

EN English Translation

Indra alone had distinguished you from flowing around at will. By being honored by Indra, you have considered yourself great. That's why you're called Udak. (4)

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