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अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 22 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 22 • मन्त्र 5

3.22.5

Mantra ID: 3.22.5

याव॒च्चत॑स्रः प्र॒दिश॒श्चक्षु॒र्याव॑त्समश्नु॒ते । ताव॑त्स॒मैत्वि॑न्द्रि॒यं मयि॒ तद्ध॑स्तिवर्च॒सम् ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 3.22.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

चारों दिशाएं जितने स्थान को व्याप्त करती हैं तथा रूप को ग्रहण करने वाले नेत्र जितने नक्षत्रों को देखते हैं, परम ऐश्वर्य वाले इंद्र का असाधारण चिह्न तथा पूर्वोक्त देवों का तेज हमें प्राप्त हो. (५)

EN English Translation

The four directions occupy as much space as they see and the constellations that the eyes that take the form, we should get the extraordinary sign of Indra with supreme opulence and the glory of the aforementioned gods. (5)

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