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अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 29 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 29 • मन्त्र 2

3.29.2

Mantra ID: 3.29.2

सर्वा॒न्कामा॑न्पूरयत्या॒भव॑न्प्र॒भव॒न्भव॑न् । आ॑कूति॒प्रोऽवि॑र्द॒त्तः शि॑ति॒पान्नोप॑ दस्यति ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 3.29.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

चारों दिशाओं को व्याप्त करने वाला, फल देने में समर्थ एवं वृद्धि करने वाला यह यज्ञ हमारी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करता है. संकल्पों को पूर्ण करने वाली यह सफेद पैरों वाली भेड़ इस यज्ञ में दी जा रही है. यह क्षीण न हो कर हमारी इच्छा के अनुसार बढ़ेगा ही. (२)

EN English Translation

This yajna, which pervades all four directions, is able to give fruits and increases, fulfills all our desires. This white-footed sheep, which fulfills the resolutions, is being given in this yagna. It will not diminish but will increase according to our wishes. (2)

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