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अथर्ववेद

Kanda 4 • Sukta 12 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 4 • सूक्त 12 • मन्त्र 2

4.12.2

Mantra ID: 4.12.2

यत्ते॑ रि॒ष्टं यत्ते॑ द्यु॒त्तमस्ति॒ पेष्ट्रं॑ त आ॒त्मनि॑ । धा॒ता तद्भ॒द्रया॒ पुनः॒ सं द॑ध॒त्परु॑षा॒ परुः॑ ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 4.12.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे शस्त्र से घायल पुरुष! तेरा जो अंग घायल और शस्त्र प्रहार की वेदना से जल रहा है तथा तेरा जो अंग मुगदर आदि के प्रहार से भग्न हो गया है, विधाता तेरे उन अंगों को लाख के द्वारा जोड़ दे. (२)

EN English Translation

O man wounded by arms! Your part which is injured and burning with the pain of arms attack and your part which has been broken by the attack of Mugdar etc., the creator should connect those parts of yours with lac. (2)

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