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अथर्ववेद

Kanda 4 • Sukta 17 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 4 • सूक्त 17 • मन्त्र 1

4.17.1

Mantra ID: 4.17.1

ईशा॑णां त्वा भेष॒जाना॒मुज्जे॑ष॒ आ र॑भामहे । च॒क्रे स॒हस्र॑वीर्यं॒ सर्व॑स्मा ओषधे त्वा ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 4.17.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सहदेवी! तू जड़ीबूटियों की स्वामिनी है. मैं शत्रु द्वारा किए गए अभिचार के दोष को शांत करने के लिए तेरा स्पर्श करता हूं. मैं अभिचार से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिए तुझे सामर्थ्य वाली बनाता हूं. (१)

EN English Translation

O Sahadevi! You are the owner of herbs. I touch You to soothe the guilt of the conduct committed by the enemy. I empower you to remove the defects arising out of abhichar. (1)

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