Popular:
अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 110 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 110 • मन्त्र 1

6.110.1

Mantra ID: 6.110.1

प्र॒त्नो हि कमीड्यो॑ अध्व॒रेषु॑ स॒नाच्च॒ होता॒ नव्य॑श्च॒ सत्सि॑ । स्वां चा॑ग्ने त॒न्वं पि॒प्राय॑स्वा॒स्मभ्यं॑ च॒ सौभ॑ग॒मा य॑जस्व ॥ (१)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.110.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सभी देवों की आत्मा होने के कारण ये अग्नि चिरंतन है. ये स्तुति के योग्य एवं यज्ञों में देवों को बुलाने वाले हैं. हे अग्नि! इस प्रकार तुम नवीन बने रहते हो. तुम अपने शरीर को घृत आदि से पूर्ण करो तथा हमारे लिए सौभाग्य प्रदान करो. (१)

EN English Translation

Being the soul of all gods, this agni is eternal. They are worthy of praise and are going to call the gods in the yagyas. O agni! In this way, you remain new. May you complete your body with ghee etc. and provide good luck for us. (1)

卐 HinduText AI