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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 132 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 132 • मन्त्र 2

6.132.2

Mantra ID: 6.132.2

यं विश्वे॑ दे॒वाः स्म॒रमसि॑ञ्चन्न॒प्स्वन्तः शोशु॑चानं स॒हाध्या । तं ते॑ तपामि॒ वरु॑णस्य॒ धर्म॑णा ॥ (२)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.132.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

विश्वै देव नामक देवों ने कामदेव को उस की पत्नी आधि अर्थात्‌ चिंता के साथ जल में डुबो दिया, क्योंकि वह उस के वियोग में संतप्त था. हे नारी! मैं तेरे लिए उस कामदेव को जल के स्वामी वरुण की धारण शक्ति से संतप्त करता हूं. (२)

EN English Translation

The gods named Vishwai Dev immersed Kamadeva in the water with his wife Aadhi i.e. anxiety, because he was suffering in his disconnection. O woman! I am for you torment that Cupid with the power of Varuna, the swami of water. (2)

शास्त्र जिज्ञासा
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