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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 51 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 51 • मन्त्र 3

6.51.3

Mantra ID: 6.51.3

यत्किं चे॒दं व॑रुण॒ दैव्ये॒ जने॑ऽभिद्रो॒हं म॑नु॒ष्या॒श्चर॑न्ति । अचि॑त्त्या॒ चेत्तव॒ धर्मं॑ युयोपि॒म मा न॒स्तस्मा॒देन॑सो देव रीरिषः ॥ (३)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.51.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे जलों के स्वामी वरुण देव! मनुष्यगण जो पाप करते हैं तथा हम सब भी अज्ञान के कारण तुम से संबंधित धर्मो के विपरीत जो कार्य करते हैं, उस अज्ञान जनित पाप के कारण हमारी हिंसा मत करो. (३)

EN English Translation

O Swami of waters Varun Dev! Do not violence the sins that human beings commit and the work that we all do against the dharmas related to you due to ignorance, because of that ignorance-caused sin. (3)

शास्त्र जिज्ञासा
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