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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 58 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 58 • मन्त्र 2

6.58.2

Mantra ID: 6.58.2

यथेन्द्रो॒ द्यावा॑पृथि॒व्योर्यश॑स्वा॒न्यथाप॒ ओष॑धीषु॒ यश॑स्वतीः । ए॒वा विश्वे॑षु दे॒वेषु॑ व॒यं सर्वे॑षु य॒शसः॑ स्याम ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 6.58.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इंद्र जिस प्रकार धरती और आकाश के मध्य वर्षा करने के कारण यशस्वी हैं, जिस प्रकार जल धान, जौ आदि की वृद्धि के कारण यशस्वी हैं. उसी प्रकार हम समस्त देवों तथा मनुष्यों में यशस्वी बनें. (२)

EN English Translation

Just as Indra is successful due to rain between the earth and the sky, just as he is successful due to the growth of water, paddy, barley etc. In the same way, let us become successful among all gods and human beings. (2)

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