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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 62 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 62 • मन्त्र 1

6.62.1

Mantra ID: 6.62.1

वै॑श्वान॒रो र॒श्मिभि॑र्नः पुनातु॒ वातः॑ प्रा॒णेने॑षि॒रो नभो॑भिः । द्यावा॑पृथि॒वी पय॑सा॒ पय॑स्वती ऋ॒ताव॑री यज्ञिये नः पुनीताम् ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 6.62.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सभी प्राणियों में जठराग्नि के रूप में वर्तमान अग्नि देव मुझे पवित्र करें. शरीर के मध्य विचरण करते हुए वायु देव मुझे श्वासोच्छ्वास के द्वारा पवित्र करें. वे ही वायु देव अंतरिक्ष में गमन करते हुए मुझे नव प्रदेशों के द्वारा पवित्र करें. जल के सार रस के द्वारा सार वाले, यज्ञ पूर्ण कराने में समर्थ तथा सत्य से पूर्ण द्यावा पृथ्वी मुझे पवित्र करें. (१)

EN English Translation

May the present Agni God sanctify me as a gastritis in all beings. While moving in the middle of the body, may vayu dev purify me through breathing. May he, the vayu dev, go to space and sanctify me through the new territories. May the earth, full of essence, capable of completing yajna and full of truth, sanctify me through the essence of water juice. (1)

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