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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 10 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 10 • मन्त्र 1

7.10.1

Mantra ID: 7.10.1

प्रप॑थे प॒थाम॑जनिष्ट पू॒षा प्रप॑थे दि॒वः प्रप॑थे पृथि॒व्याः । उ॒भे अ॒भि प्रि॒यत॑मे स॒धस्थे॒ आ च॒ परा॑ च चरति प्रजा॒नन् ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.10.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मार्ग रक्षक सूर्य देव, मार्गो के आरंभ में रक्षा करने के लिए उपस्थित होते हैं. सूर्य देव पृथ्वी एवं आकाश के प्रवेश द्वार में उपस्थित होते हैं. अत्यधिक प्रेम करने वाले एवं परस्पर एक साथ स्थित धरती और आकाश दोनों को लक्षित कर के यजमानों द्वारा किए गए कर्म और उस का फल जानते हुए सूर्य आकाश से पृथ्वी पर आते हैं और पृथ्वी से आकाश पर जाते हैं. (१)

EN English Translation

The Sun God, the protector of the way, is present to protect at the beginning of the paths. Sun God is present in the entrance of the earth and sky. The sun comes from the sky to the earth and goes from the earth to the sky, knowing the deeds done by the hosts and the fruits of it by targeting both the earth and the sky located together. (1)

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