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अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 15 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 15 • मन्त्र 1

7.15.1

Mantra ID: 7.15.1

अ॒भि त्यं दे॒वं स॑वि॒तार॑मो॒ण्योः क॒विक्र॑तुम् । अर्चा॑मि स॒त्यस॑वं रत्न॒धाम॒भि प्रि॒यं म॒तिम् ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 7.15.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

धरती और आकाश का निर्माण करने वाले सविता देव की मैं स्तुति करता हूं. ये सविता देव कमनीय कर्म करने वाले, यथार्थ के प्रेरक, रत्नों को धारण करने वाले एवं सब का प्रिय करने वाले हैं, इसलिए सब के माननीय हैं. (१)

EN English Translation

I praise Savita Dev, who created the earth and the sky. This Savita Dev is the one who does inferior deeds, the motivator of reality, the one who wears gems and loves everyone, so he is honorable to everyone. (1)

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