Popular:
अथर्ववेद

Kanda 7 • Sukta 18 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 7 • सूक्त 18 • मन्त्र 4

7.18.4

Mantra ID: 7.18.4

धा॒ता रा॒तिः स॑वि॒तेदं जु॑षन्तां प्र॒जाप॑तिर्नि॒धिप॑तिर्नो अ॒ग्निः । त्वष्टा॒ विष्णुः॑ प्र॒जया॑ संररा॒णो यज॑मानाय॒ द्रवि॑णं दधातु ॥ (४)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 7.18.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सभी कल्याणों के देने वाले धाता, कमों के प्रेरक सविता और वेदों के रक्षक प्रजापति, अग्नि, रूपों के निर्माता त्वष्टा, व्यापक देव विष्णु-ये सभी हमारे हवि को स्वीकार करें एवं यज्ञ करने वाले यजमान के लिए धन दें. (४)

EN English Translation

The giver of all welfare, Savita, the motivator of the kamon and Prajapati, the protector of the Vedas, the creator of agni, forms, the comprehensive god Vishnu - all of them should accept our havi and give money for the host who performs the yajna. (4)

卐 HinduText AI