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अथर्ववेद

Kanda 9 • Sukta 14 • Mantra 8

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 9 • सूक्त 14 • मन्त्र 8

9.14.8

Mantra ID: 9.14.8

मा॒ता पि॒तर॑मृ॒त आ ब॑भाज धी॒त्यग्रे॒ मन॑सा॒ सं हि ज॒ग्मे । सा बी॑भ॒त्सुर्गर्भ॑रसा॒ निवि॑द्धा॒ नम॑स्वन्त॒ इदु॑पवा॒कमी॑युः ॥ (८)

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अथर्ववेद मन्त्र 9.14.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सूर्य के जन्म लेते समय ही उन की माता उन के पिता की सेवा करती है. इस के फल स्वरूप वह बुद्धि और मन से युक्त हो जाती है एवं गर्भरूपी रस से निबद्ध हो जाती है. हवि का अन्न लिए हुए मनुष्य इस कथा के समीप पहुंच जाते हैं. (८)

EN English Translation

At the time of the birth of the sun, his mother serves his father. As a result of this, she becomes full of intelligence and mind and is bound by the juice of the womb. People carrying Havi's food approach this story. (8)

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