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Pt. Shailesh Upadhyay

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Pt. Shailesh Upadhyay

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Acharya in Shukla Yajurveda & Sanskrit Grammar, Varanasi

वेद, उपनिषद् एवं सनातन दर्शन का विद्यार्थी। काशी में रहकर शास्त्रों का अध्ययन एवं अध्यापन।

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Answer on: हिंदू धर्म में इतने देवी-देवता क्यों हैं?

ऋग्वेद (१.१६४.४६) का शाश्वत महावाक्य है: 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' — सत्य (ईश्वर) एक ही है, ज्ञानी जन उसे अनेक नामों और रूपों में पुकारते हैं। जैसे एक ही जल को विभिन्न भाषाओं में पानी, Water, नीर कहा जाता है, वैसे ही परब्रह्म के विभिन्न कार्य और रूप हैं।

2 महीने पहले 54 Upvotes
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Answer on: गीता में 'निष्काम कर्म' का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या बिना किसी परिणाम की अपेक्षा के कर्म करना व्यावहारिक है?

शांकरभाष्य में भगवान शंकराचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि 'कर्मणि एव अधिकारः ते, न फलेषु कदाचन'। जब जीवात्मा फल की इच्छा से बंध जाती है, तो चित्त में वासना और विक्षेप उत्पन्न होता है। निष्काम भाव चित्त-शुद्धि का सर्वश्रेष्ठ साधन है। चित्त शुद्ध होने पर ही आत्म-ज्ञान संभव होता है।

2 महीने पहले 13 Upvotes
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Answer on: अद्वैत वेदान्त के अनुसार 'माया' क्या है? क्या संसार पूर्णतः असत्य अथवा काल्पनिक है?

माया की दो शक्तियां बताई गई हैं: आवरण और विक्षेप। आवरण शक्ति सत्य (ब्रह्म) को छुपाती है, और विक्षेप शक्ति असत्य (द्वैत जगत्) का भान कराती है। ज्ञान से आवरण हटते ही केवल परब्रह्म ही शेष रहता है।

2 महीने पहले 38 Upvotes
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वर्ण व्यवस्था और जन्म आधारित जाति में क्या मौलिक अंतर है? शास्त्रों में इसका क्या स्वरूप मिलता है?

अक्सर आधुनिक विमर्श में 'वर्ण' और 'जाति' को एक ही समझ लिया जाता है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त और श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय के अनुसार वर्ण का निर्धारण किस आधार पर बताया गया है और कालांतर में यह जन्मगत कैसे हुआ?

2 महीने पहले 649 Views 11 Upvotes
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Answer on: सनातन धर्म में मूर्ति पूजा का वास्तविक दार्शनिक आधार क्या है?

अनुराधा जी, यह प्रश्न सनातन धर्म के समन्वयवादी दृष्टिकोण को समझने की कुंजी है। १. अरूप से रूप की यात्रा: ईश्वर सर्वव्यापी और निराकार है—जैसे वायु सर्वत्र है, परंतु उसका अनुभव करने के लिए हमें पंखा चाहिए; जैसे दूध में मक्खन सर्वत्र व्याप्त है, परंतु उसे निकालने के लिए मंथन की प्रक्रिया चाहिए। इसी प्रकार विग्रह (मूर्ति) निराकार परब्रह्म का साकार प्रतीक (Symbolic Manifestation) है। २. चित्त की एकाग्रता (Alambana): पतंजलि योगसूत्र और वेदान्त दोनों स्वीकार करते हैं कि साधारण मानव मन अमूर्त (Abstract) पर तुरंत एकाग्र नहीं हो सकता। जब मन को एक आलम्बन (Form/Image) दिया जाता है, जिसमें तेज, करुणा, ज्ञान और पवित्रता के भाव हों, तो चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं। ३. प्राण-प्रतिष्ठा का रहस्य: सनातन धर्म में केवल पाषाण या धातु की पूजा नहीं होती। जब तक वैदिक मंत्रों द्वारा उसमें 'प्राण-प्रतिष्ठा' नहीं होती, वह केवल एक कलाकृति है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वह विग्रह साधक के लिए साक्षात् ईश्वरीय ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। श्रीमद्भागवत में भगवान कहते हैं: "मनो-मय्यात्म-रूपेण मन्मयीं मूर्तिमुद्वहन्।" विग्रह के माध्यम से साधक धीरे-धीरे स्थूल से सूक्ष्म और अंततः सर्वव्यापक चैतन्य की ओर अग्रसर होता है।

2 महीने पहले 38 Upvotes
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Answer on: क्या महाभारत का युद्ध वास्तव में हुआ था या यह केवल एक रूपक (Mythology) है? पुरातात्विक व खगोलीय साक्ष्य क्या कहते हैं?

संस्कृत साहित्य में 'इतिहास' शब्द की परिभाषा ही यह है: "धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम्। पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते॥" अर्थात् जिसमें वास्तविक पूर्व घटनाओं (True historical events) के साथ चतुर्विध पुरुषार्थ का उपदेश हो। वाल्मीकि रामायण और वेदव्यास महाभारत को 'काव्य' नहीं, 'इतिहास' की संज्ञा दी गई है।

2 महीने पहले 72 Upvotes
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Answer on: मांडूक्य उपनिषद् में वर्णित 'तुरीय' अवस्था क्या है और यह जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति से कैसे भिन्न है?

पूजा जी, मांडूक्य उपनिषद् वेदान्त का सार है। आचार्य गौड़पाद की कारिका और मांडूक्य उपनिषद् के सातवें मंत्र में तुरीय का अत्यंत विलक्षण निरूपण हुआ है: नान्तप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥ (मांडूक्य मंत्र ७) १. तुरीय कोई 'अवस्था' नहीं, स्वयं आधार (Witness) है: जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति आती-जाती रहती हैं। जैसे सिनेमा के पर्दे पर कभी सुखद दृश्य आता है, कभी दुखद और कभी पर्दा खाली रहता है—किन्तु पर्दा स्वयं किसी दृश्य से न तो भीगता है और न जलता है। ठीक वैसे ही, तुरीय वह नित्य चैतन्य (Pure Consciousness) है जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है। २. तीनों का विश्लेषण: जाग्रत: बहिर्मुखी चेतना, जहाँ इन्द्रियाँ और विषय सक्रिय हैं। स्वप्न: अन्तर्मुखी चेतना, जहाँ मन पूर्व संस्कारों से अपनी सृष्टि रचता है। सुषुप्ति: अविद्या का आवरण, जहाँ मन लीन होता है और प्रज्ञानघन की स्थिति होती है (गाढ़ी निद्रा)। तुरीय: जब साधक समझता है कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों का अनुभव करने वाला 'मैं' शुद्ध आत्म-स्वरूप हूँ। ३. अनुभव की विधि: साधना में जब प्रणव (ॐ) के तीन मात्रायें—अ-कार (जाग्रत), उ-कार (स्वप्न), म-कार (सुषुप्ति) का लय 'अमात्र' (शांत ओंकार ध्वनि के उपरांत की नीरवता) में होता है, तब बुद्धि तुरीय भाव में प्रतिष्ठित होती है। यह कोई शून्य नहीं, बल्कि पूर्ण बोध की स्थिति है।

2 महीने पहले 28 Upvotes
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Answer on: भगवान शिव के वक्षस्थल (छाती) पर माँ काली का पैर क्यों है? इसका वास्तविक दार्शनिक और तांत्रिक रहस्य क्या है?

रामकृष्ण परमहंस जी कहते थे—"जैसे दूध और उसकी धवलता, अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति अभिन्न हैं, वैसे ही शिव और काली अभिन्न हैं।" अज्ञानी लोग इसे केवल क्रोध समझते हैं, जबकि ज्ञानी इसमें परब्रह्म की महाशक्ति का साक्षात्कार करते हैं।

2 महीने पहले 56 Upvotes
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