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Vijay Kumar

पूछा गया Aug 26, 2026 at 10:48 PM • Philosophy

हिंदू धर्म में इतने देवी-देवता क्यों हैं?

क्या अनेक देवता हैं या एक ही परम सत्य के अलग-अलग रूप हैं?

4 उत्तर

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Pt. Shailesh Upadhyay
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उत्तर दिया गया 2 महीने पहले

ऋग्वेद (१.१६४.४६) का शाश्वत महावाक्य है: 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' — सत्य (ईश्वर) एक ही है, ज्ञानी जन उसे अनेक नामों और रूपों में पुकारते हैं। जैसे एक ही जल को विभिन्न भाषाओं में पानी, Water, नीर कहा जाता है, वैसे ही परब्रह्म के विभिन्न कार्य और रूप हैं।

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Dr. Anuradha Sharma
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उत्तर दिया गया 2 महीने पहले

वेदों में 33 कोटि देवताओं का उल्लेख है, जहाँ 'कोटि' का अर्थ 'प्रकार' (33 Types / Supreme Principles) है, न कि 33 करोड़। इनमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, इन्द्र और प्रजापति सम्मिलित हैं जो प्रकृति के संतुलन को दर्शाते हैं।

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Pooja Rajvanshi
Pooja Rajvanshi 310

उत्तर दिया गया 2 महीने पहले

सनातन धर्म में 'इष्टदेवता' की सुंदर संकल्पना है। हर व्यक्ति की मानसिक प्रकृति (स्वभाव) भिन्न होती है। कोई मातृत्व भाव से माँ दुर्गा को पूजता है, कोई सखा भाव से श्रीकृष्ण को, कोई वैराग्य भाव से महादेव को। यह आध्यात्मिकता का लोकतंत्र (Spiritual Freedom) है।

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Mukesh Chandra Joshi
Mukesh Chandra Joshi 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 520

उत्तर दिया गया 2 महीने पहले

वृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य-शाकल्य संवाद में अंततः 33 से घटकर केवल 'एक ब्रह्म' पर ही प्रतिष्ठा होती है। अनेकता में एकता ही सनातन का प्राण है।

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सम्बन्धित वैदिक मन्त्र

प्राचीन वेदों के मूल प्रमाण एवं ऋचाएं

ऋग्वेद मण्डल 3, सूक्त 29, मन्त्र 9

कृ॒णोत॑ धू॒मं वृष॑णं सखा॒योऽस्रे॑धन्त इतन॒ वाज॒मच्छ॑ । अ॒यम॒ग्निः पृ॑तना॒षाट् सु॒वीरो॒ येन॑ दे॒वासो॒ अस॑हन्त॒ दस्यू॑न् ॥ (९)

हे मित्र अध्वर्यु! तुम अरणिमंथन द्वारा कामवर्षक अग्नि को उत्पन्न करो. यदि वह उत्पन्न न हो तो तुम सामर्थ्यवान्‌ बनकर मंथनरूपी युद्ध में लगो. शोभन सामर्थ्य वाले अग्नि सेना के विजेता हैं. इन्हीं की सहायता से देवों ने असुरों को पराजित किया था. (९)

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 9, मन्त्र 7

सं गोम॑दिन्द्र॒ वाज॑वद॒स्मे पृ॒थु श्रवो॑ बृ॒हत् । वि॒श्वायु॑र्धे॒ह्यक्षि॑तम् ॥ (७)

हे इंद्र! हमें गायों एवं अन्न के साथ-साथ अधिक मात्रा में धन दो. यह धन इतना विस्तृत हो कि समस्त आयु भर खर्च होने पर भी समाप्त न हो. (७)

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 170, मन्त्र 1

न नू॒नमस्ति॒ नो श्वः कस्तद्वे॑द॒ यदद्भु॑तम् । अ॒न्यस्य॑ चि॒त्तम॒भि सं॑च॒रेण्य॑मु॒ताधी॑तं॒ वि न॑श्यति ॥ (१)

) इंद्र ने कहा-“आज या कल वास्तव में कुछ नहीं है. जो कार्य विचित्र है, उसे कौन जानता है? अन्य लोगों का मन इतना चंचल होता है कि वे जो भी पढ़ते हैं, सो भूल जाते हैं.” (१)

सम्बन्धित उपनिषद्

कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 6, मन्त्र 15

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥ १५ ॥

जिस समय इस जीवनमें ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥

उपनिषद् दर्शन देखें

सम्बन्धित भगवद्गीता श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4, श्लोक 35

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव | येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि (var अशेषाणि) ||४-३५||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

गीता श्लोक भाष्य पढ़ें
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 22

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च | गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ||११-२२||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

गीता श्लोक भाष्य पढ़ें
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प्रश्न विवरण

पूछा गया Aug 26, 2026
विषय Philosophy
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उत्तर 4
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