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Raghavendra Kulkarni

@raghav_kulkarni

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Raghavendra Kulkarni

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Software Architect | Reader of Bhagavad Gita & Shankara Bhashya

बेंगलुरु में टेक प्रोफेशनल, मन से सनातन का जिज्ञासु। आधुनिक जीवन में गीता के व्यावहारिक सिद्धांतों को समझने का प्रयास।

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Answer on: मांडूक्य उपनिषद् में वर्णित 'तुरीय' अवस्था क्या है और यह जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति से कैसे भिन्न है?

दैनिक जीवन में जब हम ध्यान (Meditation) की गहरी अवस्था में बैठते हैं, जहाँ विचार रुक जाते हैं किन्तु पूर्ण जागरूकता बनी रहती है, वह तुरीय का ही एक प्रारंभिक क्षणिक आभास (Glimpse) है।

2 weeks ago 27 Upvotes
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Answer on: अद्वैत वेदान्त के अनुसार 'माया' क्या है? क्या संसार पूर्णतः असत्य अथवा काल्पनिक है?

जोशी जी, आपने वेदान्त के सबसे बहुप्रतीक्षित और गलत समझे जाने वाले विषय पर प्रश्न पूछा है। अद्वैत वेदान्त में तीन प्रकार की सत्ताओं (Orders of Reality) का वर्णन आता है: प्रतिभासिक सत्ता (Illusory Reality): जैसे रस्सी में सांप का दिखना या स्वप्न देखना। जाग्रत होते ही यह तुरंत बाधित (नष्ट) हो जाता है। व्यावहारिक सत्ता (Empirical Reality): यह वह संसार है जिसमें हम सब जीते हैं, खाते-पीते हैं, समाज और कर्तव्य निभाते हैं। जब तक आत्म-ज्ञान नहीं होता, तब तक यह संसार शत-प्रतिशत सत्य और प्रभावी है। भूख लगने पर भोजन ही करना पड़ता है। पारमार्थिक सत्ता (Absolute Reality): केवल परब्रह्म, जो त्रिकाल अबाधित (अतीत, वर्तमान, भविष्य में कभी न बदलने वाला) है। 'मिथ्या' का वास्तविक अर्थ: संस्कृत में 'मिथ्या' का अर्थ 'झूठ' या 'असत्य' नहीं, बल्कि 'अनिर्वचनीय' (न सत्, न असत्) है। अर्थात् जो नित्य नहीं है, जिसका स्वरूप परिवर्तनशील है। जैसे मिट्टी से बना घड़ा—घड़ा रूप में सत्य दिखता है, लेकिन मूलतः वह मिट्टी ही है। इसलिए आदि शंकराचार्य जी ने कभी कर्म या कर्तव्यों का तिरस्कार नहीं किया, बल्कि अद्वैत बोध के साथ निष्काम भाव से लोक-कल्याण करने की प्रेरणा दी है।

2 weeks ago 42 Upvotes
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Answer on: क्या महाभारत का युद्ध वास्तव में हुआ था या यह केवल एक रूपक (Mythology) है? पुरातात्विक व खगोलीय साक्ष्य क्या कहते हैं?

हाल ही में उत्तर प्रदेश के सिनौली (Sinauli) में मिले 4000 वर्ष प्राचीन रथ, शाही समाधियां और तांबे की तलवारें भी सिद्ध करती हैं कि प्राचीन भारत में एक अत्यंत विकसित योद्धा व वैदिक संस्कृति उपस्थित थी।

2 weeks ago 51 Upvotes
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Answer on: Is dietary vegetarianism mandatory in Sanatan Dharma according to original Vedic and Upanishadic texts?

Sanatan Dharma approaches food not as a dogmatic commandment, but through the foundational lens of Ahimsa (non-harming) and the three Gunas. 1. The Highest Ideal is Ahimsa: In the Mahabharata (Anushasana Parva 115.47), it is famously declared: "अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं दमः। अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः॥" Non-violence is the supreme virtue. The Chandogya Upanishad (8.15.1) explicitly commands non-injury to all beings (*Ahimsan sarva-bhutani*). 2. Gita's Classification of Food (Chapter 17, Verses 8-10): Satvik food (pure, fresh, plant-based, wholesome) promotes clarity of consciousness, vitality, and spiritual evolution. Heavy and flesh-based foods promote Rajas (restlessness) and Tamas (inertia). Thus, while regional and historical exceptions existed for warriors and specific geographies, vegetarianism is indisputably the highest spiritual ideal for spiritual seekers.

3 weeks ago 24 Upvotes
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Answer on: Did ancient India really have advanced Vimanas/flying machines, or are modern claims an exaggeration of poetic texts?

I completely agree with Pt. Shailesh and Raghavendra. We should take pride in what ancient India truly gave the world: the decimal system, Aryabhata's calculation of Earth's rotation, Kanāda's atomic theory (Vaisheshika), and Charaka's holistic medicine. Falsely claiming ancient nuclear bombs and physical airplanes without archaeological evidence distracts from our real scientific heritage.

3 weeks ago 40 Upvotes
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भगवान शिव के वक्षस्थल (छाती) पर माँ काली का पैर क्यों है? इसका वास्तविक दार्शनिक और तांत्रिक रहस्य क्या है?

सोशल मीडिया और सामान्य चर्चाओं में माँ काली के शिवजी के ऊपर खड़े होने और जीभ बाहर निकालने के दृश्य को केवल एक पौराणिक कथा मान लिया जाता है। किन्तु शाक्त दर्शन, सांख्य और कश्मीर शैवदर्शन में शिव और शक्ति के इस दिव्य स्वरूप का क्या गहरा तात्विक व ब्रह्मांडीय अर्थ है? कृपया विस्तार से समझाएं।

3 weeks ago 11273 Views 84 Upvotes
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गीता में 'निष्काम कर्म' का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या बिना किसी परिणाम की अपेक्षा के कर्म करना व्यावहारिक है?

नमस्ते विद्वतजनों, जब हम भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का श्लोक पढ़ते हैं: *कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।* *मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥* तो अक्सर मन में यह संशय उठता है कि आधुनिक जीवन या कार्यक्षेत्र (corporate/business) में बिना किसी लक्ष्य (Target/Goal) या फल की योजना बनाए कोई कार्य कैसे संभव है? यदि परिणाम की चिंता ही न हो तो प्रेरणा (motivation) कहाँ से आएगी? क्या निष्काम कर्म का अर्थ लक्ष्यहीन होना है या इसका कोई गहरा मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक अर्थ है? कृपया व्यावहारिक उदाहरण सहित मार्गदर्शन करें।

3 weeks ago 1429 Views 22 Upvotes
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Answer on: मंदिरों में घंटी बजाना, चरण स्पर्श करना और परिक्रमा लगाने के पीछे क्या आध्यात्मिक व वैज्ञानिक तर्क है?

जोशी जी, सनातन परंपरा की कोई भी विधि अर्थहीन नहीं है। हर क्रिया के पीछे सूक्ष्म शरीर और ऊर्जा का विज्ञान है: १. मंदिर की घंटी (ध्वनि तरंग चिकित्सा): मंदिर की घंटी विशिष्ट अष्टधातुओं (तांबा, जस्ता, रांगा, पीतल आदि) के अनुपात से ढाली जाती है। जब इस पर आघात होता है, तो ॐकार की गूंज जैसी तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न होती है जो मस्तिष्क के बाएं और दाएं दोनों गोलार्धों (Hemispheres) को तुरंत संतुलित करती है। इसकी प्रतिध्वनि (Echo) कम से कम 7 सेकंड तक रहती है, जो हमारे शरीर के 7 मुख्य चक्रों को एकाग्र और सजग कर देती है। २. चरण स्पर्श (ऊर्जा चक्र का परिपथ): मानव शरीर में ऊर्जा का प्रवाह सिर (उत्तरी ध्रुव) से पैरों (दक्षिणी ध्रुव) की ओर होता है। जब हम दोनों हाथों को क्रॉस करके किसी पूज्य व्यक्ति के दोनों पैरों को स्पर्श करते हैं, तो एक पूर्ण इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सर्किट बनता है। बड़ों का आशीष, सकारात्मक ऊर्जा और सद्भाव हमारे भीतर प्रवाहित होता है। ३. परिक्रमा (Center of Energy): गर्भगृह वह स्थान है जहाँ प्राण-प्रतिष्ठित विग्रह से सकारात्मक ऊर्जा तरंगे निरंतर विकिरित होती हैं। दक्षिणावर्त (Clockwise) परिक्रमा करने से साधक उस ऊर्जा-वलय (Energy Aura) को अपने शरीर में अवशोषित कर लेता है।

3 weeks ago 34 Upvotes
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