पूजा जी, माँ काली का भगवान शिव की छाती पर खड़ा होना सनातन दर्शन में 'चेतना और शक्ति' (Consciousness & Dynamic Energy) का सर्वोच्च दार्शनिक प्रतीक है।
१. शिव शव-समान हैं शक्ति के बिना (शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः):
आदि शंकराचार्य जी ने सौन्दर्यलहरी के प्रथम श्लोक में लिखा है कि बिना पराशक्ति के भगवान शिव भी स्पंदन नहीं कर सकते। शिव 'शांत चैतन्य' (Pure Static Consciousness / Purusha) हैं, और माँ काली 'गतिशील ब्रह्मांडीय ऊर्जा' (Dynamic Kinetic Energy / Prakriti) हैं। जब तक ऊर्जा आधारहीन है, वह विध्वंसक हो सकती है; किन्तु जैसे ही वह शिव (परम बोध) को स्पर्श करती है, वह शांत हो जाती है।
२. जीभ बाहर निकलना (लज्जा नहीं, त्रिगुण नियंत्रण):
तांत्रिक प्रतीकवाद में माँ काली की लाल जीभ 'रजोगुण' का प्रतीक है, जिसे श्वेत दांतों (सत्त्वगुण) से दबाया गया है। यह दर्शाता है कि ज्ञानी साधक को सत्त्व से रजोगुण पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
३. मुंडमाला और खड्ग:
५० नरमुंडों की माला संस्कृत वर्णमाला के ५० अक्षरों (मातृकाओं/नाद) का प्रतीक है। खड्ग 'अज्ञान के उच्छेदन' और अभय मुद्रा 'भयमुक्ति' का प्रतीक है।
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