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Raghavendra Kulkarni
Raghavendra Kulkarni 290

Asked Aug 25, 2026 at 01:25 PM Hindu Philosophy

भगवान शिव के वक्षस्थल (छाती) पर माँ काली का पैर क्यों है? इसका वास्तविक दार्शनिक और तांत्रिक रहस्य क्या है?

सोशल मीडिया और सामान्य चर्चाओं में माँ काली के शिवजी के ऊपर खड़े होने और जीभ बाहर निकालने के दृश्य को केवल एक पौराणिक कथा मान लिया जाता है।

किन्तु शाक्त दर्शन, सांख्य और कश्मीर शैवदर्शन में शिव और शक्ति के इस दिव्य स्वरूप का क्या गहरा तात्विक व ब्रह्मांडीय अर्थ है? कृपया विस्तार से समझाएं।

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Dr. Anuradha Sharma
Dr. Anuradha Sharma This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 450

Answered 3 weeks ago

पूजा जी, माँ काली का भगवान शिव की छाती पर खड़ा होना सनातन दर्शन में 'चेतना और शक्ति' (Consciousness & Dynamic Energy) का सर्वोच्च दार्शनिक प्रतीक है।

१. शिव शव-समान हैं शक्ति के बिना (शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः):
आदि शंकराचार्य जी ने सौन्दर्यलहरी के प्रथम श्लोक में लिखा है कि बिना पराशक्ति के भगवान शिव भी स्पंदन नहीं कर सकते। शिव 'शांत चैतन्य' (Pure Static Consciousness / Purusha) हैं, और माँ काली 'गतिशील ब्रह्मांडीय ऊर्जा' (Dynamic Kinetic Energy / Prakriti) हैं। जब तक ऊर्जा आधारहीन है, वह विध्वंसक हो सकती है; किन्तु जैसे ही वह शिव (परम बोध) को स्पर्श करती है, वह शांत हो जाती है।

२. जीभ बाहर निकलना (लज्जा नहीं, त्रिगुण नियंत्रण):
तांत्रिक प्रतीकवाद में माँ काली की लाल जीभ 'रजोगुण' का प्रतीक है, जिसे श्वेत दांतों (सत्त्वगुण) से दबाया गया है। यह दर्शाता है कि ज्ञानी साधक को सत्त्व से रजोगुण पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

३. मुंडमाला और खड्ग:
५० नरमुंडों की माला संस्कृत वर्णमाला के ५० अक्षरों (मातृकाओं/नाद) का प्रतीक है। खड्ग 'अज्ञान के उच्छेदन' और अभय मुद्रा 'भयमुक्ति' का प्रतीक है।

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Amitabh Tripathi

Answered 2 weeks ago

तांत्रिक दृष्टिकोण से माँ काली का रूप संपूर्ण सृष्टि-लय का प्रतीक है। शिव 'शव' समान शांत हैं (Pure Consciousness) और शक्ति उनके ऊपर नृत्य कर रही हैं (Active Dynamic Kinetic Energy)। जब तक शिव शक्ति से युक्त नहीं होते, वे कोई कार्य नहीं कर सकते (शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्)।

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Mukesh Chandra Joshi
Mukesh Chandra Joshi This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 520

Answered 3 weeks ago

आधुनिक भौतिक विज्ञान (Quantum Physics) के अनुसार भी सारा ब्रह्मांड Energy (काली) और Underlying Vacuum/Field (शिव) का खेल है। शिव के बिना काली अनियंत्रित ऊर्जा हैं और काली के बिना शिव निष्क्रिय आधार हैं। दोनों की एकात्मता ही सृष्टि और मुक्ति का मूल है।

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Pt. Shailesh Upadhyay
Pt. Shailesh Upadhyay This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 380

Answered 3 weeks ago

रामकृष्ण परमहंस जी कहते थे—"जैसे दूध और उसकी धवलता, अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति अभिन्न हैं, वैसे ही शिव और काली अभिन्न हैं।" अज्ञानी लोग इसे केवल क्रोध समझते हैं, जबकि ज्ञानी इसमें परब्रह्म की महाशक्ति का साक्षात्कार करते हैं।

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Pooja Rajvanshi
Pooja Rajvanshi 310

Answered 3 weeks ago

यह रूपक हमें यह भी सिखाता है कि जब हमारी इंद्रियां और सांसारिक वृत्तियां अनियंत्रित हो जाएं, तो उन्हें शांत करने के लिए भीतर के 'शिव' (आत्म-साक्षी भाव) को जाग्रत करना अनिवार्य है।

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Vijay Kumar

Answered 3 days ago

Uuyg

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Vijay Kumar
3 days ago
Ok

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सम्बन्धित वैदिक मन्त्र (Related Vedic Verses)

प्राचीन वेदों के मूल प्रमाण एवं ऋचाएं

ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 190, मन्त्र 3

सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत् । दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्ष॒मथो॒ स्वः॑ ॥ (३)

ईश्वर ने पूर्वकाल के अनुसार सूर्य और चंद्रमा को बनाया. उसने इसके बाद ह्युलोक, पृथ्वी एवं अंतरिक्ष को बनाया. (३)

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 47, मन्त्र 3

अश्वि॑ना॒ मधु॑मत्तमं पा॒तं सोम॑मृतावृधा । अथा॒द्य द॑स्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ गच्छतम् ॥ (३)

हे यज्ञवर्द्धनकर्ता अश्विनीकुमारो! अत्यंत मधुर सोमरस पिओ. इसके पश्चात्‌ तुम रथ में धन लेकर हविदाता यजमान के समीप आओ. (३)

ऋग्वेद मण्डल 3, सूक्त 33, मन्त्र 7

प्र॒वाच्यं॑ शश्व॒धा वी॒र्यं१॒॑ तदिन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ यदहिं॑ विवृ॒श्चत् । वि वज्रे॑ण परि॒षदो॑ जघा॒नाय॒न्नापोऽय॑नमि॒च्छमा॑नाः ॥ (७)

“इंद्र ने अहि राक्षस को मारा था. उसके इस वीर कर्म को सदा कहना चाहिए. इंद्र ने चारों ओर बैठे हुए बाधाकारक असुरों को वज्र से मारा था. इसके बाद गमन का अभिलाषी जल बरसा.” (७)

सम्बन्धित उपनिषद् (Upanishads)

केनोपनिषद् खण्ड/अध्याय 4, मन्त्र 7

उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७॥

शिष्य ने कहा - हे भगवन् ! मुझे वह रहस्यमयी विद्या (उपनिषद्) का उपदेश दीजिये। आचार्य ने कहा - मैंने तुझसे उस रहस्यमयी विद्या (उपनिषद्) का वर्णन कर दिया है। निश्चय ही मैंने तुझसे ब्रह्म सम्बन्धी उपनिषद् का वर्णन किया है। आचार्य कहते हैं कि हे शिष्य तुमने जो उपनिषद् पूछी थी, सो हमने उपनिषद् कह दी। अब हम तुम्हे ब्रह्म सम्बन्धिनी उपनिषद् का व्याख्यान करेंगे। उपनिषद् का अर्थ है जिससे ब्रह्म की समीपता प्राप्त हो। ॥७॥

उपनिषद् दर्शन देखें
कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 6, मन्त्र 15

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥ १५ ॥

जिस समय इस जीवनमें ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥

उपनिषद् दर्शन देखें

श्रीमद्भगवद्गीता (Gita Verses)

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 9, श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच | इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे | ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||९-१||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

गीता श्लोक भाष्य पढ़ें
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13, श्लोक 6

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च | इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ||१३-६||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

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Asked Aug 25, 2026
Topic Hindu Philosophy
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