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Pt. Shailesh Upadhyay
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पूछा गया Aug 24, 2026 at 01:25 PM • Dharma Shastra

मंदिरों में घंटी बजाना, चरण स्पर्श करना और परिक्रमा लगाने के पीछे क्या आध्यात्मिक व वैज्ञानिक तर्क है?

आज की युवा पीढ़ी प्रायः पूछती है कि क्या सनातन धर्म के मंदिर रीति-रिवाज केवल अंधविश्वास हैं या इनके पीछे कोई सुविचारित वैज्ञानिक, मानसिक और आध्यात्मिक पद्धति है?

१. गर्भगृह में प्रवेश से पूर्व घंटी बजाना २. बड़ों का चरण स्पर्श करना ३. विग्रह की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करना

इन परंपराओं का शास्त्रीय व व्यावहारिक रहस्य क्या है?

3 उत्तर

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Raghavendra Kulkarni
Raghavendra Kulkarni 290

उत्तर दिया गया 2 महीने पहले

जोशी जी, सनातन परंपरा की कोई भी विधि अर्थहीन नहीं है। हर क्रिया के पीछे सूक्ष्म शरीर और ऊर्जा का विज्ञान है:

१. मंदिर की घंटी (ध्वनि तरंग चिकित्सा):
मंदिर की घंटी विशिष्ट अष्टधातुओं (तांबा, जस्ता, रांगा, पीतल आदि) के अनुपात से ढाली जाती है। जब इस पर आघात होता है, तो ॐकार की गूंज जैसी तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न होती है जो मस्तिष्क के बाएं और दाएं दोनों गोलार्धों (Hemispheres) को तुरंत संतुलित करती है। इसकी प्रतिध्वनि (Echo) कम से कम 7 सेकंड तक रहती है, जो हमारे शरीर के 7 मुख्य चक्रों को एकाग्र और सजग कर देती है।

२. चरण स्पर्श (ऊर्जा चक्र का परिपथ):
मानव शरीर में ऊर्जा का प्रवाह सिर (उत्तरी ध्रुव) से पैरों (दक्षिणी ध्रुव) की ओर होता है। जब हम दोनों हाथों को क्रॉस करके किसी पूज्य व्यक्ति के दोनों पैरों को स्पर्श करते हैं, तो एक पूर्ण इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सर्किट बनता है। बड़ों का आशीष, सकारात्मक ऊर्जा और सद्भाव हमारे भीतर प्रवाहित होता है।

३. परिक्रमा (Center of Energy):
गर्भगृह वह स्थान है जहाँ प्राण-प्रतिष्ठित विग्रह से सकारात्मक ऊर्जा तरंगे निरंतर विकिरित होती हैं। दक्षिणावर्त (Clockwise) परिक्रमा करने से साधक उस ऊर्जा-वलय (Energy Aura) को अपने शरीर में अवशोषित कर लेता है।

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Dr. Anuradha Sharma
Dr. Anuradha Sharma 卐 This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 450

उत्तर दिया गया 2 महीने पहले

आगम शास्त्रों में कहा गया है: "आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्। घण्टानादं प्रकुर्वीत तथा विघ्नोपशान्तये॥" — घंटी का नाद समस्त नकारात्मक मानसिक विचारों को भगाकर सात्विक भाव जाग्रत करता है।

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Pooja Rajvanshi
Pooja Rajvanshi 310

उत्तर दिया गया 2 महीने पहले

आधुनिक जीवन में जब मन लगातार तनाव और स्क्रीन से घिरा रहता है, मंदिर का शांत वातावरण, चंदन की सुगंध, घंटी की ध्वनि और परिक्रमा एक संपूर्ण बायो-एनर्जेटिक हीलिंग (Bio-energetic Healing) का कार्य करती है।

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सम्बन्धित वैदिक मन्त्र

प्राचीन वेदों के मूल प्रमाण एवं ऋचाएं

ऋग्वेद मण्डल 5, सूक्त 52, मन्त्र 2

ते हि स्थि॒रस्य॒ शव॑सः॒ सखा॑यः॒ सन्ति॑ धृष्णु॒या । ते याम॒न्ना धृ॑ष॒द्विन॒स्त्मना॑ पान्ति॒ शश्व॑तः ॥ (२)

वे धीर हैं एवं स्थिर शक्ति के मित्र हैं. वे मार्ग में भ्रमण करने वाले हैं एवं अपने आप हमारी संतान की रक्षा करते हैं. (२)

ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 46, मन्त्र 10

यं त्वा॑ दे॒वा द॑धि॒रे ह॑व्य॒वाहं॑ पुरु॒स्पृहो॒ मानु॑षासो॒ यज॑त्रम् । स याम॑न्नग्ने स्तुव॒ते वयो॑ धाः॒ प्र दे॑व॒यन्य॒शसः॒ सं हि पू॒र्वीः ॥ (१०)

हे हव्य वहन करने वाले अग्नि! देवों ने तुम्हें धारण किया. हे यज्ञ योग्य अग्नि! अभिलाषाएं करने वाले मनुष्यों ने तुम्हें धारण किया. हे अग्नि! यज्ञ में मुझ स्तोता को अन्न दो. देवाभिलाषी यजमान तुमसे बहुत से यश प्राप्त करता है. (१०)

ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 81, मन्त्र 3

वि॒श्वत॑श्चक्षुरु॒त वि॒श्वतो॑मुखो वि॒श्वतो॑बाहुरु॒त वि॒श्वत॑स्पात् । सं बा॒हुभ्यां॒ धम॑ति॒ सं पत॑त्रै॒र्द्यावा॒भूमी॑ ज॒नय॑न्दे॒व एकः॑ ॥ (३)

विश्वकर्मा की आंखें, मुख, बाहु एवं चरण सब ओर फैले हुए हैं. उस देव ने अकेले ही बाहुओं और चरणों से भली-भांति गति करके द्यावा और भूमि को बनाया. (३)

सम्बन्धित उपनिषद्

कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 4, मन्त्र 11

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन। मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥

मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है। इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नहीं है। जो पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको जाता है ॥ ११॥

उपनिषद् दर्शन देखें
कठोपनिषद् खण्ड/अध्याय 3, मन्त्र 2

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतःशकेमहि ॥ २ ॥

जो यजन करनेवालोंके लिये सेतुके समान है उस नाचिकेत अग्रिको तथा जो भयशून्य है और संसारको पार करनेकी इच्छावालोंका परम आश्रय है उस अक्षर ब्रह्मको जाननेमें हम समर्थ हों ॥ २ ॥

उपनिषद् दर्शन देखें

सम्बन्धित भगवद्गीता श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 18

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ||११-१८||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

गीता श्लोक भाष्य पढ़ें
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1, श्लोक 40

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः | धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||१-४०||

श्रीमद्भगवद्गीता का पावन उपदेश

गीता श्लोक भाष्य पढ़ें
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विषय Dharma Shastra
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