जोशी जी, सनातन परंपरा की कोई भी विधि अर्थहीन नहीं है। हर क्रिया के पीछे सूक्ष्म शरीर और ऊर्जा का विज्ञान है:
१. मंदिर की घंटी (ध्वनि तरंग चिकित्सा):
मंदिर की घंटी विशिष्ट अष्टधातुओं (तांबा, जस्ता, रांगा, पीतल आदि) के अनुपात से ढाली जाती है। जब इस पर आघात होता है, तो ॐकार की गूंज जैसी तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न होती है जो मस्तिष्क के बाएं और दाएं दोनों गोलार्धों (Hemispheres) को तुरंत संतुलित करती है। इसकी प्रतिध्वनि (Echo) कम से कम 7 सेकंड तक रहती है, जो हमारे शरीर के 7 मुख्य चक्रों को एकाग्र और सजग कर देती है।
२. चरण स्पर्श (ऊर्जा चक्र का परिपथ):
मानव शरीर में ऊर्जा का प्रवाह सिर (उत्तरी ध्रुव) से पैरों (दक्षिणी ध्रुव) की ओर होता है। जब हम दोनों हाथों को क्रॉस करके किसी पूज्य व्यक्ति के दोनों पैरों को स्पर्श करते हैं, तो एक पूर्ण इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सर्किट बनता है। बड़ों का आशीष, सकारात्मक ऊर्जा और सद्भाव हमारे भीतर प्रवाहित होता है।
३. परिक्रमा (Center of Energy):
गर्भगृह वह स्थान है जहाँ प्राण-प्रतिष्ठित विग्रह से सकारात्मक ऊर्जा तरंगे निरंतर विकिरित होती हैं। दक्षिणावर्त (Clockwise) परिक्रमा करने से साधक उस ऊर्जा-वलय (Energy Aura) को अपने शरीर में अवशोषित कर लेता है।
No comments yet. Be the first to comment on this answer!