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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 141 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 141 • ऋचा / मन्त्र 1

1.141.1

Mantra ID: 1.141.1

बळि॒त्था तद्वपु॑षे धायि दर्श॒तं दे॒वस्य॒ भर्गः॒ सह॑सो॒ यतो॒ जनि॑ । यदी॒मुप॒ ह्वर॑ते॒ साध॑ते म॒तिरृ॒तस्य॒ धेना॑ अनयन्त स॒स्रुतः॑ ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.141.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

द्योतनशील अग्नि का दर्शनीय वह तेज सब लोग शरीर की दृढ़ता के लिए धारण करते हैं, क्योंकि वह बल से उत्पन्न है. यह बात सत्य है. यह प्रसिद्ध है कि उसी तेज का सहारा लेकर मेरी बुद्धि कार्य करती है और अपना इष्ट सिद्ध करती है. यज्ञसाधक अग्नि के तेज को ही सबकी स्तुतियां प्राप्त होती हैं. (१)

EN English Translation

The visible brightness of the demonic fire is possessed by all people for the firmness of the body, because it is produced by force. That's the truth. It is famous that by resorting to the same speed, my intellect works and proves its favor. It is only the brightness of the yajnashak agni that everyone gets praise. (1)

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