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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 145 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 145 • ऋचा / मन्त्र 2

1.145.2

Mantra ID: 1.145.2

तमित्पृ॑च्छन्ति॒ न सि॒मो वि पृ॑च्छति॒ स्वेने॑व॒ धीरो॒ मन॑सा॒ यदग्र॑भीत् । न मृ॑ष्यते प्रथ॒मं नाप॑रं॒ वचो॒ऽस्य क्रत्वा॑ सचते॒ अप्र॑दृपितः ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.145.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सब लोग अग्नि को पूछते हैं. उनके अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं पूछते. धीर अग्नि पूछने पर वही बात बताते हैं जो उनके मन में होती है, प्रश्न के अनुकूल उत्तर नहीं देते. ये अग्नि अपने वाकय से पहले और बाद के वचनों को सहन नहीं करते. इस कारण द॑भहीन व्यक्ति अग्नि का ही सहारा लेता है. (२)

EN English Translation

Everyone asks the fire. Don't ask anyone other than them. When asked, Dhir Agni says the same thing that is in his mind, does not give a favorable answer to the question. These fires do not tolerate the words before and after their speech. Because of this, the blind person takes the help of fire. (2)

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