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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 71 • Mantra / Rik 8

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 71 • ऋचा / मन्त्र 8

1.71.8

Mantra ID: 1.71.8

आ यदि॒षे नृ॒पतिं॒ तेज॒ आन॒ट् छुचि॒ रेतो॒ निषि॑क्तं॒ द्यौर॒भीके॑ । अ॒ग्निः शर्ध॑मनव॒द्यं युवा॑नं स्वा॒ध्यं॑ जनयत्सू॒दय॑च्च ॥ (८)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.71.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अग्नि का शुद्ध एवं दीप्त तेज अन्न के लिए जठराग्नि के रूप में यजमान को व्याप्त कर ले. उसी तेज द्वारा परिपक्व वीर्य गर्भस्थान में पहुंचकर पुत्र उत्पन्न करे तथा उसे शुभ कर्म में प्रेरित करे. (८)

EN English Translation

Purify the agni and the brightest fast engulf the host in the form of a gastroesophageal for food. By the same swiftness, mature semen reaches the womb and produces a son and motivates him in auspicious deeds. (8)

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