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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 132 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 132 • ऋचा / मन्त्र 5

10.132.5

Mantra ID: 10.132.5

अ॒स्मिन्स्वे॒३॒॑तच्छक॑पूत॒ एनो॑ हि॒ते मि॒त्रे निग॑तान्हन्ति वी॒रान् । अ॒वोर्वा॒ यद्धात्त॒नूष्ववः॑ प्रि॒यासु॑ य॒ज्ञिया॒स्वर्वा॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.132.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मित्र देव के हितैषी बन जाने के कारण मुझ शकपूत ऋषि में स्थित पाप नीच शत्रुओं को नष्ट करता है. मित्र देव आकर हमारे शरीरों की रक्षा करें तथा यज्ञों की प्रिय सामग्री को सुरक्षित करें. (५)

EN English Translation

The sin in my sage Shakput destroys the lowly enemies because of the friend god's benefactor. May the friend God come and protect our bodies and protect the beloved material of the yagnas. (5)

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