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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 135 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 135 • ऋचा / मन्त्र 2

10.135.2

Mantra ID: 10.135.2

पु॒रा॒णाँ अ॑नु॒वेन॑न्तं॒ चर॑न्तं पा॒पया॑मु॒या । अ॒सू॒यन्न॒भ्य॑चाकशं॒ तस्मा॑ अस्पृहयं॒ पुनः॑ ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.135.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मेरे पिता ने निर्दयतापूर्वक आज्ञा दी कि मैं अपने पूर्वजों का साथी बनू, मैंने निंदापूर्वक उनकी ओर देखा. अब मैं उनके प्रति अनुराग रखता हूं.” (२)

EN English Translation

My father cruelly commanded that I be the companion of my ancestors, I looked at him with condemnation. Now I have a love for them." (2)

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