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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 27 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 27 • ऋचा / मन्त्र 4

10.27.4

Mantra ID: 10.27.4

यदज्ञा॑तेषु वृ॒जने॒ष्वासं॒ विश्वे॑ स॒तो म॒घवा॑नो म आसन् । जि॒नामि॒ वेत्क्षेम॒ आ सन्त॑मा॒भुं प्र तं क्षि॑णां॒ पर्व॑ते पाद॒गृह्य॑ ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.27.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

“जिस समय मैं सहसा सामने आए युद्ध में सम्मिलित होता हूं, उस समय सारे ऋषि मेरे आसपास बैठते हैं. मैं प्रजा के कल्याण के लिए उस चारों ओर घूमने वाले शत्रु को जीतता हूं तथा उसके पैर पकड़कर उसे पर्वत के ऊपर फेंक देता हूं.” (४)

EN English Translation

"At the time I join the war that usually unfolds, all the sages sit around me. I conquer the enemy who moves around him for the welfare of the people and hold his feet and throw him on the mountain." (4)

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